Jul 31, 2014

GM Crops: Tampering with nature and human health (in Hindi)

This horrifying picture is of the rats that were fed with Roundup Ready GM corn by Dr Seralini in France. After the feeding trails lasting 2 years, which corresponds to some 80 years of human life, this is what Dr Seralini observed.

डीएनए में छेड़छाड़ कर तैयार किए गए बीजों से उत्पादन में वृद्धि के दावे किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इन बीजों से फसल लेने पर कीटनाशकों का उपयोग भी कम करना पड़ता है लेकिन तथ्य कुछ और ही कहानी कहते हैं। उत्पादन में कोई खास इजाफा नहीं हुआ, उल्टे कीटनाशकों का उपयोग बढ़ गया। इन फसलों को खाने से मानव स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा, इसका तो कोई प्रमाणिक अध्ययन ही नहीं हुआ है। इन बीजों का धंधा अरबों का जो है।

देविन्दर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ


पर्यावरणविदे ने मानव दूध में डीडीटी अवशिष्ट के बारे में हमें बता दिया था। हम यह भी जानते हैं कि डीडीटी कीटनाशक पेंगुइन के रक्त में भी मिला है जिससे पता चलता है कि इस रसायन का खतरनाक स्तर तक उपयोग हो रहा है। इसे स्वीकार करने में हमें चालीस साल लग गए कि डीडीटी एक हानिकारक प्रदूषक है। जब वैश्विक स्तर पर हानिकारक रसायनों को हटाने का प्रयास हो रहा है, तब कई लोग जीएम फसलों के माध्यम से बढ़ते विषाक्त पदार्थों को लेकर मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति चिंतित हैं। नया अनुमान हमें बताता है कि एक हेक्टेयर में लगे बीटी पौध अपने भीतर ही ४.२ किग्रा. विषाक्त बनाते हैं जो रासायनिक कीटनाशक के औसत इस्तेमाल से १९ गुना है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक कनाडा का एक अध्ययन है जिससे पता चलता है कि ९३ फीसदी गर्भवती महिलाओं के रक्त और ८० फीसदी भू्रण में बीटी से सम्बंधित कीटनाशक मौजूद है। कनाडा के इस चौकाने वाले अध्ययन ने वाशिंगटन विश्वविद्यालय में मानव विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. ग्लेन डेविस स्टोन को यह पूछने के लिए मजबूर कर दिया कि इसका मानव स्वास्थ्य के लिए मतलब क्या है? उत्तर कोई नहीं जानता। वास्तव में लोगों के चिंता का यही वास्तविक कारण है। वैज्ञानिक जीएम प्रौद्योगिकी के संभावित खतरों के बारे में दीर्घकालिक अध्ययन क्यों नहीं करते हैं? आसान-सा तर्क यह दिया जाता है कि अमरीका के लोग पिछले बीस साल से जीएम खाद्य पदार्थ खा रहे हैं और इससे वहां किसी की भी मौत नहीं हुई है। यह नहीं बताया जाता कि जीएम बीजों के कारोबार में लगे व्यापारी इनके दुष्परिणामों के बारे में क्लिनिकल परीक्षण ही नहीं होने देते।
अब अमरीका की भारत पर नजर


अमरीका में जब पहली जीएम फसल के रूप में वर्ष १९९४ में जीएम टमाटर लगाया गया तो इसके बाद वहां रोगों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ोतरी हुई। एलर्जी के मामलों में ४०० फीसदी की वृद्धि हुई, अस्थमा में ३०० फीसदी और ऑटिज्म में १५०० फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। अमरीका विकसित देशों में सबसे बीमार देश है। बेशक, इसके जीएम से सीधे सम्बन्ध के कोई प्रमाण नहीं हैं लेकिन यह प्रमाण भी तो नहीं है कि कोई सम्बन्ध नहीं है। विकीलीक्स ने खुलासा किया ही था कि वर्ष २००७ में कैसे पेरिस में अमरीकी दूतावास ने वाशिंगटन से जीएम फसलों के विरोध करने पर यूरोपीय संगठन के खिलाफ सैन्य शैली में व्यापारिक युद्ध शुरू करने की अपील की थी। एक साल बाद, २००८ में, अमरीका और स्पेन ने जीएम फसलों की उपयोगिता साबित करने के लिए यूरोप में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ाने की साजिश रची थी। यूरोप में अब भी जीएम फसलों की स्वीकारता नहीं है, लिहाजा भारत मुख्य लक्ष्य बना हुआ है। विकीलीक्स ने यह भी खुलासा किया कि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवश्ंाकर मेनन ने भारत में जीएम फसलों के लिए तेजी से रास्ता खोलने की बात की थी। यूरोप की तरह भारत भी जीएम फसलों को नहीं स्वीकारेगा तो अरबों डॉलर का यह उद्योग समाप्त भी हो सकता है। बहुत सारे राज्यों ने जीएम फसलों के जमीनी परीक्षण की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। संसद की स्थायी समिति और सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टेक्नीकल एक्सपर्ट कमेटी की आपत्तियों के बाद यह उद्योग दूसरे चैनलों के माध्यम से दबाव बना रहा है। देश में सत्ता परिवर्तन के बाद जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी की ओर से १५ फसलों के खुले परीक्षण की पहल को भी इसी नजरिए से देखा जा सकता है। हालांकि कुछ संगठनों के विरोध के  बाद सरकार ने जीएम फसलों के फील्ड ट्रॉयल  पर रोक लगा दी है।


उत्पादन पर कोई खास असर नहीं

बहरहाल, पहले हमें इस उद्योग के वैज्ञानिक दावों को समझना होगा। जीएम लॉबी का कहना है कि जीएम टेक्नोलॉजी से पैदावार में सुधार करने की काफी संभावना है लेकिन सच्चाई यह है कि अमरीका द्वारा पहली जीएम फसल लाने के बीस साल बाद वहां ऐसी कोई भी जीएम फसल नहीं है जिसमें पैदावार बढ़ गई हो। अमरीका के कृषि विभाग के खुद के अध्ययन से यह पता चला है जीएम मक्का और सोयाबीन की पैदावार पारंपरिक किस्मों की तुलना में घटी है। यहां तक कि भारत में, द सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉटन रिसर्च (सीआईसीआर) नागपुर ने स्वीकार किया कि वर्ष २००४-११ के बीच कुल कपास उत्पादन में बीटी का क्षेत्र ५.४ फीसद से ९६ फीसदी हो गया लेकिन पैदावार में वृद्धि के खास संकेत नहीं मिले। इसलिए यह तर्क गलत है कि वर्ष २०५० तक बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए जीएम फसलों की जरूरत है। क्या विश्व में खाद्यान्न की कमी है? यूएसडीए के अनुमानों के अनुसार वर्ष २०१३ में विश्व में १४ अरब लोगों का पेट भर सके, इतना खाद्यान्न का उत्पादन हुआ। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विश्व की आबादी को दोगुना उत्पादन हुआ। असली समस्या करीब ४० फीसदी खराब होने वाले खाद्यान्न को लेकर है। अकेले अमरीका में १६५ अरब डॉलर के खाद्य उत्पाद खराब हो जाते हैं। भारत में जहां रोज २५ करोड़ लोग भूखे सोने को मजबूर हैं। भुखमरी की इस गम्भीर समस्या का खाद्यान्न उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं है। पिछले साल ८२३ लाख टन खाद्यान्न का सरप्लस था। यह तो तब, जब वर्ष २०१२-१३ में २२० लाख टन खाद्यान्न निर्यात कर दिया गया और इस साल १८० लाख टन खाद्यान्न निर्यात करने की योजना है। कृषि मंत्रालय खाद्यान्न खरीद में कमी और एफसीआई में रखे अनाज का वायदा कारोबार में उपयोग की सोच रहा है। 


कीटनाशकों की बढ़ती खपत


वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता चाल्र्स बेनब्रूक के अनुसार १९९६ से २०११ के बीच अमरीका के खेतों में १८१० लाख लीटर रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया गया और वर्ष २०१२ में जीएम खेती करने वाले किसानों ने औसतन २० फीसदी अधिक कीटनाशक का प्रयोग किया। नई जीएम जींसों के शामिल किए जाने के कारण अब इसमें ५ प्रतिशत की और वृद्धि होने का अनुमान है। अर्जेंटीना में दो दशक पहले ३४० लाख लीटर रसायनिक कीटनाशकों का उपयोग होता था जो जीएम सोयाबीन के कारण अब बढ़कर ३१७० लाख लीटर हो गया है। अर्जंेटीना के किसान प्रति एकड़ अमरीकी किसानों से लगभग दो गुना कीटनाशक काम ले रहे हैं। ब्राजील में भी जीएम फसल के कारण कीटनाशकों की खपत में १९० प्रतिशत का इजाफा हुआ है। चीन में भी किसान पहले की तुलना में बीस गुना अधिक कीटनाशक काम लेने लगे हैं। भारत भी अछूता नहीं है।  २०१० तक ९० प्रतिशत बीटी कॉटन की खेती होने लगी और ८८०.४ करोड़ रुपए के कीटनाशक का इस्तेमाल किया गया। अधिक चिंता की बात ऐसे खरपतवारों का बढऩा है, जिन्हें नष्ट करना बहुत मुश्किल है। इन्हें सुपर वीड्स कहा जाता है। अमरीका में लगभग १००० लाख एकड़ भूमि इनसे संक्रमित हो चुकी है। इन्हें समाप्त करने के लिए घातक दवाओं का उपयोग हो रहा है। कनाडा में १० लाख एकड़ में सुपर वीड्स फैल चुकी हैं। शोध बताते हैं कि जीएम फसल के चलन के बाद २१ वीड्स ने प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। कीटों में भी यही हो रहा है। भारत में बोलवोर्म नामक कीड़ा प्रतिरोधी बन रहा है। जब न तो जीएम बीजों से उत्पादन ही बढ़ रहा और न ही कीटनाशकों का उपयोग कम हो रहा तो फिर क्यों जीएम फसलों की वकालत की जा रही है। अब जैविक खेती की ओर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।


Source: Rajasthan Patrika, July 31 2014.
http://epaper.patrika.com/c/3241805

4 comments:

Anonymous said...

An extra-ordinary example of Organic farming:- visit here: http://www.yogickheti.com/

Vaanbhatt said...

विचारपरक लेख के लिए बधाई...आदमी अपनी नस्ल को छोड़ कर सभी की नस्ल बदल देना चाहता है...बीज, उर्वरक और रसायन लाभ देने वाले उद्योग बन गये...जिनके लिये किसान एक मार्केट से ज्यादा कुछ नहीं है...

Mahesh said...

Pest In Brazil Has Evolved Resistance Against GMO Corn

Lavesh Agrawal said...

Human is too small to fight and change the course of nature. Early we realize better would be our next generations.