Feb 25, 2010

कृषि का अमेरिकी माडल

For my friends who are a little uncomfortable with English, here is my article in Hindi that analyses a couple of the fundamental reasons behind the prevailing agrarian crisis. The change in the mindset of the agricultural students, made possible through the land-grant system of education that we borrowed blindly from US of A, and on which our agricultural universities are based, is primarily the reason for our obsession with risky alien technologies.

I am therefore not the least surprised when agricultural universities lobby tooth-and-nail to push for harmful technologies like Bt brinjal. They have been programmed to reject anything that is traditional and sustainable. They have been made to believe that following the sophisticated technology model from the US is the only way out for India. They think that the spate of farmer suicides is merely a price that the country has to pay for higher production.

I think the greatest challenge is to reform the prevailing agricultural research and education system. It is time we go in for a complete overhaul of the research curriculum in a  manner that we begin to respect our own time-tested technologies, and are able to understand how these technologies/farming systems lead us to sustainable farming, with no addition to global warming, and do not result in farmer suicides.

I am beginning a series on where we went wrong. In the days to come, I will bring you more such articles.

कृषि का अमेरिकी माडल
http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_6207894.html

Feb 24, 2010

स्साकसी शुरू हो गई है। वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैगन पर फैसला टाल कर बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। अब तक उनके कम से कम तीन वरिष्ठ सहयोगी शरद पवार, पृथ्वीराज चव्हाण और कपिल सिब्बल इस फैसले के विरोध में खड़े हो चुके हैं। यह जताने की कोशिश हो रही है कि बीटी बैगन को ठंडे बस्ते में डालने से भारत की खाद्य सुरक्षा को आघात लगा है। हमें यह भी बताया जा रहा है कि विज्ञान का समाज से कोई सरोकार नहीं होता और हर सूरत में विज्ञान ही श्रेष्ठ है, चाहे यह दोषपूर्ण और नुकसानदायक क्यों न हो।

नियामक इकाई जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी द्वारा बीटी बैगन को हरी झंडी देने में किए गए तमाम भ्रष्टाचार और वैज्ञानिक छल-कपट की अनदेखी करते हुए ये मंत्री बीटी बैगन की व्यावसायिक खेती को अनुमति देना चाहते हैं। यह मिथ्या धारणा कि विज्ञान किसानों के लिए हमेशा फायदेमंद है, पहले ही खेतों को लहूलुहान कर चुकी है। पिछले 15 साल में करीब दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। अगर विकल्प प्रदान किया जाए तो 45 प्रतिशत से अधिक किसान खेती को छोड़ देना चाहते हैं।

पहले ही, रासायनिक पदार्र्थो, जैसे खाद, कीटनाशक और हाइब्रिड बीजों ने मिट्टी की सेहत खराब कर दी है और भूजल को सोख लिया है। किंतु इससे पहले मैं यह बताऊं कि हरित क्रांति ने कृषि को कैसे तबाह किया है फिलहाल यह समझना जरूरी है कि कृषि-व्यापार उद्योग ने किस तरह हमारी सोच को बदल दिया है। किसी न किसी तरह हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी है कि प्रौद्योगिकी हमेशा मुक्तिदाता होती है। यह देखना अहम है कि वर्तमान संकट को बढ़ाने में हमारी सोच में बदलाव का कितना बड़ा हाथ है।

बेहद चालाकी से यूएस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट ने अमेरिका के लैंड ग्रांट माडल के आधार पर भारत में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना की है। यह भारत की आवश्यकताओं के बजाए मुख्यत: अमेरिका की इच्छा के अनुरूप स्थापित किए गए हैं। हमें बताया गया है कि कृषि घटिया और पिछड़ा धंधा है और अकुशल लोगों का काम है। अमेरिकी तर्ज पर हमारे कृषि विश्वविद्यालयों में यही सिखाया जाता है।

कृषि विश्वविद्यालयों में यह भी सिखाया जाता है कि अगर आप भारतीय कृषि में सुधार लाना चाहते हैं तो अमेरिकी कृषि माडल अपनाना होगा। हम आंख मूंदकर अमेरिकी कृषि प्रौद्योगिकी को अपना रहे हैं, नतीजे में भारतीय कृषि को भयानक संकट झेलना पड़ रहा है। अगर कृषि अनुसंधान और शिक्षा का अमेरिकी माडल इतना ही बेहतर है तो खेती बर्बादी के कगार पर क्यों है? किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं और अन्नदाता भूखा क्यों है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि कोई भयावह गड़बड़ी हो रही है? एक राष्ट्र के रूप में हमें इसकी पड़ताल करनी चाहिए और पलटकर पीछे देखना चाहिए।

किसान जानते हैं कि उन्होंने धरती माता को लूट लिया है और वे अधिक समय तक इससे उपज हासिल नहीं कर सकते। कृषि वैज्ञानिकों को यह स्वीकार करना चाहिए कि जिस प्रौद्योगिकी की वे वकालत कर रहे थे, उसने धरती को बंजर बना दिया है और धीरे-धीरे यह रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है। उन्हें भारत की परखी हुई प्रौद्योगिकी पर भरोसा रखना चाहिए, जिन पर आयातित सोच से आघात पहुंचा है।

अब लैब से जमीन प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है। हमने सबसे बड़ी गलती यह की कि परंपरागत खेती और किसानों से सीखने की कोशिश नहीं की। कृषि संकट के तमाम हल उनके पास हैं। हम यह मानकर उन्हें दरकिनार कर देते हैं कि उन्हें कुछ पता ही नहीं। नतीजा यह है कि किसान साल दर साल परंपरागत ज्ञान से विमुख होते जा रहे हैं। हम सब अंधेरे में भटक गए हैं।

कृषि वैज्ञानिक नहीं जानते कि बंजर जमीन में कैसे उर्वरता लाई जाए। कृषि को बचाने के सरल उपाय के रूप में वे परदेसी प्रौद्योगिकी के आयात पर निर्भर रहना चाहते हैं और इसीलिए बीटी बैगन पर जोर लगा रहे हैं। एक बार बीटी बैगन को अनुमति मिल जाती है तो यह अनेक जीएम फसलों की बाढ़ ला देगा। इस प्रकार की फसलें, चाहे इनकी आवश्यकता न हो और इनसे उत्पादन भी न बढ़े, कम से कम कृषि विश्वविद्यालयों का तो कल्याण कर ही देंगी। तब कोई भी यह नहीं कह पाएगा कि ये विश्व विद्यालय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।

पिछले 40-50 साल से हमें बताया गया है कि जितना रासायनिक खाद डालोगे उपज में उतनी ही बढ़ोतरी होगी। यह एक गलत सोच है और इसने हमारी आशंका से अधिक नुकसान पहुंचाया है। अध्ययन से पता चलता है कि भारत के जिन जिलों में खाद की खपत अधिक है, उनमें उत्पादकता उतनी ही कम है। दूसरी तरफ, जिन जिलों में अधिक उत्पादकता है, वहां खाद की खपत कम है। देश में प्रति हेक्टेयर सर्वाधिक उपज वाला जिला केरल का वायानाद है। जबकि खाद की खपत में इसका स्थान 600 जिलों में से 315वां है। इससे क्या आपको नहीं लगता कि खाद की खपत घटनी चाहिए। किंतु जैसे ही आप यह बात कहेंगे, कृषि वैज्ञानिक हायतौबा मचाना शुरू कर देंगे कि इससे राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

यही हाल बीटी बैगन का है। यह भी कृषि-व्यवसाय उद्योग की पैदावार है। इसीलिए राजनेताओं और कृषि वैज्ञानिकों का इसे जबरदस्त समर्थन हासिल है। हमें इस पर ध्यान देना चाहिए कि औद्योगिक उत्पादों से नुकसान अधिक होता है। अगर आप सही फैसला नहीं लेते तो दूसरो को दोष न देना। हम सबको इसलिए परेशानी उठानी पड़ सकती है कि यह महत्वपूर्ण और नाजुक फैसला वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के हाथ में है।

1 comment:

Prakash Pandey said...

air on our political scene. There has to be a mass movement to bring meaningful changes and it has to involve the youth....... not necessarily through protests,but through participation and awareness campaigns at the grass-root level.........