Jan 23, 2010

Monarch butterfly is on its way out



For those who love nature, and the wonderful creatures of nature, here is a disturbing news. The beautiful monarch butterflies that you have seen ever since you were a child is finding it difficult to survive. Their habitat is under a severe threat. Perhaps one of the main reasons for their dwindling population is the spread of GM crops.

Read this para from the enclosed report: "Although weather can affect population numbers from year to year, Dr. Taylor said, the monarchs have been suffering from a loss of habitat. One problem is the massive expansion in the amount of genetically modified corn and soybeans planted by farmers. These crops have led to an increase in herbicide use, which has eliminated milkweed plants that the butterfly larvae depend on for food."

The full report Monarch Butterfly count at a record low can be viewed at: http://www.theglobeandmail.com/news/world/monarch-butterfly-count-at-a-record-low/article1435827/

1 comment:

Anonymous said...

आदरणीय देवेंद्र जी तितलियों के विलुप्‍त होने की खबर देने के लिए धन्‍यवाद । बढ़ती जनसंख्‍या, उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति, शहरीकरण, जल-जंगल-जमीन पर से स्‍थानीय समुदायों का छिनता स्‍वामित्‍व बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की आक्रामक नीतियां, जीएम फसलों का बढ़ता प्रचलन जैसे कारणों से दुनिया भर में विविधता तेजी से नष्‍ट हो रही है । इसे पशुधन विविधता के उदाहरण से समझा जा सकता है । प्रकृति के उतार-चढ़ाव के अनुसार ढली पशुधन की प्रजातियां पिछले दस हजार वर्षों से कृषि उत्‍पादन तंत्र का अभिन्‍न अंग बनी हुई हैं । ये प्रजातियां ऐसी विषम परिस्‍थितियों में भी आजीविकास सुरक्षा देती हैं जहां कृषि कार्य या तो कठिन है या असंभव । दुनिया के दो सौ करोड़ लोग अपनी आजीविका के लिए प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से इन पशुओं से जुड़े हुए हैं । लेकिन पशुधन की इस विशाल संपदा में सेंध लगनी शुरू हो चुकी है । इन प्रजातियों का स्‍थान अब पशुओं की कुछेक ऊंची उत्‍पादकता वाली प्रयोगशाला निर्मित किस्‍में दुनिया भर में छाने लगी हैं । इनमें यूरोपीय मूल के पशु मुख्‍य हैं । संर्कीण आनुवंशिक आधार वाली ये प्रजातियां उत्‍तरी अमेरिका और यूरोप के बाद विकासशील देशों की स्‍थानीय प्रजातियां को निगलना शुरू कर दिया है । उदाहरण के लिए वियतनाम में 1994 में कुल सूअरों में 72 प्रतिशत स्‍थानीय प्रजाति के थे जो कि 2002 में 26 प्रतिशत ही रह गए । कीनिया में विदेशी मूल की डारपर भेड़ों के आगमन से भेड़ों की लाल मसाई प्रजातियां सदा के लिए विलुप्‍त हो गईं । भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो दुधारू पशुओं की असंख्‍य प्रजातियों में से अब गिनी-चुनी प्रजातियां ही बची हैं । गाय-भैंसों का ब्‍यान अब 8-9 की जगहि 4-5 तक सीमित हो गया है अर्थात वे समय से पहले बूढ़ी होती जा रही हैं । यही प्रवृत्‍ति सभी विकासशील देशों में जारी है । संयुक्‍त राष्‍ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार विश्‍व की पांच में से एक प्रजाति विलुप्‍त होने के कगार पर है । संकीर्ण आनुवंशिक आधार वाले पशुओं का तेजी से प्रसार परंपरागत पशु संपदा को हानि पहुंचा रहा है । आज पशुओं की मात्र 14 प्रजातियां मनुष्‍य की खाद्य आवश्‍यकताओं के 90 प्रतिशत की आपूर्ति करती हैं । यह प्रवृत्‍ति वैश्‍विक खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ विकास के लिए गंभीर खतरा है । विदेशी प्रजाति के पशुओं की उत्‍पादकता अधिक है, लेकिन एक बड़ी समस्‍या यह है कि अधिकांश विकासशील देश गर्म और आर्द जलवायु वाले हैं जबकि ये प्रजातियां यूरोप व अमेरिका की जलवायु दशाओं के अनुकूल हैं । यह अनुमान है कि दुनिया भर के किसानों में पशुओं की 4000 प्रजातियां प्रचलित हैं लेकिन इनमें से मात्र 400 प्रजातियां ही ब्रीडिंग कार्यक्रम के तहत ली गई हैं । इस प्रकार बहुसंख्‍यक विशेषकर विकासशील देशों की प्रजातियां ब्रीडिंग कार्यक्रम की परिधि से दूर हैं । स्‍पष्‍ट है पशुधन विविधता नष्‍ट करने में पशुपालन क्षेत्र की बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां जुट गई हैं । अपने उद्देश्‍यों को हासिल करने के लिए ये साम-दाम-दंड-भेद सभी उपायों को अपना रही हैं ।

रमेश कुमारु दुबे
कृषि विषयक स्‍वतंत्र लेखक
09868321452