Jun 11, 2009

Food-for-all is possible

The largest selling Hindi daily Dainik Jagran (also the world's most read newspaper) recently launched its national edition. It has carried a detailed report/analysis on the need for the Food Security Act that the government is contemplating. I was asked whether this scheme is feasible. My reply is that this is a programme that the nation was awaiting for over 60 years now.

For nearly 320 million people who go to bed hungry everynight, the number of hungry being almost equal to the entire population of the United States, food is God. I admire Sonia Gandhi for showing what Indian politicians of all colours lacked -- the political will to feed the nation. I always used to wonder why can't successive Prime Ministers ever think of feeding the nation, a task they are supposed to undertake if they really were to go by the Directive Principles, if they really believed in democracy being for the people. 

Anyway, better late than never. The National Food Security Act has to be planned first very meticulously, based on the foundations of sustainability, and cannot be a stand-alone kind of a programme. It will need integration with several other schemes, and even revisiting some of our international commitments mainly in the arena of trade. It is a programme that has to be planned by people who care for the hungry, and not by bureaucrats and policy planners. If they were capable of doing it, there wouldn't have been any hungry by now. India wouldn't have been ranked below countries of the sub-Saharan Africa in the Global Hunger Index.

I am so excited at the prospect the Food-for-all programme offers. This was my dream (like many of you) all these years. I never thought India would in reality ever launch such a programme, which can be easily turned into a Zero Hunger programme. This is the right investment a hungry nation like India has to make. Invest on people. People are your biggest asset. They are not a burden.

Jai Ho !!

देवेंद्र शर्मा 1984 में मैं राजीव गाधी के साथ देश के एक सुदूर गांव की यात्रा पर था। राजीव ने गांव की एक वृद्ध महिला से पूछा, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? उस महिला ने एक वाक्य में कहा, बेटा अनाज दे दो। राजीव ने बहुत दुखी मन से कहा कि आजादी के इतने साल बाद भी देश का यह हाल है कि लोग अनाज के लिए तरस रहे हैं। यह एक कड़वा सच है। आज भी इस स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। ऐसे में यह सरकार जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लाने की बात कर रही है, उससे आशा की कुछ किरण नजर आती है। सबको भोजन मिले, आम जनता के लिए यही सबसे बड़ा अधिकार है। एक सवाल उठता है कि जीने का अधिकार तो हमारा मूल अधिकार है, लेकिन जिस भोजन के माध्यम से जीवित रहेंगे, उसकी तो कोई बात ही नहींकर रहा। अगर इतने सालों बाद अब यह आवाज सरकार के कानों तक पहुंची है तो यह देश की भूखी जनता की जीत है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत कई सरकारें अपने-अपने राज्यों में दो-तीन रुपये किलो के हिसाब से प्रत्येक परिवार को 25-25 किलो चावल और गेहूं दे रही हैं, लेकिनइसके पीछे एक बड़ा सवाल है कि यह अनाज वे किसे दे रही हैं? यह एक बड़ी समस्या है कि असली जरूरतमंद को वह चीज नहींमिल पाती है, जिसके लिए उसे आरंभ किया गया है। इसलिए मेरा सुझाव है कि बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) और एपीएल (अपर पॉवर्टी लाइन) से ऊपर उठकर हंगर प्रोग्राम चलाया जाए। जो भूखा हो उसे भोजन मिले, चाहे वह जो भी हो। गावों में अनाज वितरण की एक प्रणाली का जिक्र करना चाहूंगा और वह है गोला प्रणाली। इस व्यवस्था में चाहे कोई अमीर हो या गरीब, अगर उसके पास अनाज अधिक है तो वह जरूरतमंद को देता है और जब वह लिया हुआ अनाज वापस करता है तो कुछ अधिक मात्रा में। इससे एक चेन बनी रहती है। ऐसे ही फूड गेन सिस्टम पर जोर देना होगा। कालाहांडी में अकाल पड़ा तो वे जगहें अप्रभावित रहीं,जहां फूड गेन सिस्टम चल रहा था। गांधी जी कहा करते थे कि महत्वपूर्ण यह नहींहै कि लोगों द्वारा अनाज पैदा किया जाए, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि लोगों के लिए पैदा किया जाए। यही बात राइट टू फूड के बारे में भी कही जा रही है कि फूड सिक्योरिटी से ज्यादा जरूरी है फूड सावरिनिटी। फूड सिक्योरिटी का लक्ष्य होता है कि अनाज मिले, चाहे वह देश में पैदा हो या विदेश से आए। व‌र्ल्ड बैंक ने वर्ष 1996 में कहा था कि 2015 तक भारत के 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन करेंगे यानी अमेरिका की जनसंख्या के बराबर लोग। जाहिर है, जब इतनी भारी तादाद में लोग शहर जाएंगे तो नि:संदेह खेती करने वाले लोगों में भी कमी आएगी। ऐसी स्थिति में बताइए कौन-सा ऐसा देश है, जहां से आप इतना अनाज ले आएंगे? अमेरिका में मात्र सात लाख किसान हैं, जबकि हमारे देश में इनकी संख्या साठ करोड़ है। उन्हें खेत से निकाल देंगे तो देश को अन्न कहां से मिलेगा? फूड सावरिनिटी का लक्ष्य है देश के ही लोग, देश के लिए अन्न पैदा करें। मैं एक बात फिर से दोहराना चाहूंगा कि सरकार का यह प्रयास प्रशंसनीय तो है, लेकिन इसे लागू करने में कोई हड़बड़ी न दिखाई जाए। पहले उत्पादन और वितरण की प्रणाली को सुधारा जाए। सरकार कहती है कि हम तो किसानों को सब्सिडी दे रहे हैं। अरे, किन किसानों को सब्सिडी दे रहे हैं? देश का 60 प्रतिशत किसान तो बाजार तक पहुंच ही नहीं पाता। हमारे यहां चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी को भी एक निश्चित वेतन मिलता है, लेकिन किसानों के लिए ऐसी कोई व्यस्था नहीं है। उनके लिए भी ऐसा कुछ होना ही चाहिए। जरूरी यह भी है कि जनता ऐसी योजनाओं के लिए सरकार पर दबाव बनाए। हजारों करोड़ की योजनाएं आती हैं तो उसकी सफलता-असफलता पर हम सवाल खड़े नहीं करते और जब गरीबों के लिए दो-तीन रुपये की योजनाएं आती हैं तो हम सवाल खड़े करने लगते हैं। याद रखिए ऐसे प्रोग्राम भी हमारे देश का भविष्य तय करेंगे। इसलिए इनकी सफलता की कामना कीजिए।

(लेखक खाद्य एवं कृषि नीतियों के विशेषज्ञ हैं)

1 comment:

Anonymous said...

आदरणीय देवेन्‍द्र जी मैं आपके इस विचार से सहमत हॅ कि भूखे व्‍यक्‍ति के लिए रोटी ही भगवान होती है लेकिन भोजन का अधिकार कानून लागू हो जाने से क्‍या भुखमरी दूर हो जाएगी ? दूसरे कया इससे निठल्‍लेपन को बढ़ावा नहीं मिलेगा ? मैं उत्‍तर प्रदेश के एक गांव का व्‍यक्‍तिगत अनुभव बता रहा हॅँ कि वहां के गरीब लोग बंटाई पर खेती करना व दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना छोड़ दिया है। वे कहते हैं कि जब सरकार नाममात्र की कीमत पर 35 किलो अनाज दे रही है तो हम मेहनत क्‍यों करें ? मैं भुखमरी या अकाल का समर्थन नहीं कर रहा हॅू लेकिन भुखमरी दूर करने का यह संकुचित रास्‍ता है । सरकार को चाहिए कि वह कृषि में निवेश बढ़ाए ओर कृषि व ग्रामीण जीवन का विविधीकरण करे । इससे न केवल खाद्य अपितु पोषण सुरक्षा भी हासिल होगी । राजस्‍थान के अलवर क्षेत्र में तरुण भारत संघ के प्रयासों से जल संरक्षण के परंपरागत उपायों को अपनाकर श्‍वेत क्रांति लाई गई । इससे अलवर क्षेत्र में विकास की नई गाथा लिखी गई । इसी प्रकार के देशव्‍यापी प्रयासों की जरूरत है ।
रमेश दुबे