Jun 1, 2009

शिक्षा में सुधार की शर्त

एक समय था जब किसी विश्वविद्यालय के कुलपति से मुलाकात बड़ी प्रेरणादायी होती थी। आप खड़े होकर पूरे मान-सम्मान के साथ उन्हें सुनते थे। दुर्भाग्य से अब ऐसा नहीं है। वजह जो भी हो, कुलपति अब प्रेरित नहीं करते। ईमानदारी से कहा जाए तो आज एक हद तक स्थिति यह है कि आप कुलपति से मुलाकात करने के बजाए उनसे बचना चाहेंगे। कुलपति के रूप में एक संस्था में पतन का सिलसिला कुछ समय पहले शुरू हुआ। इस संस्था को लगा रोग संभवत: आखिरी चरण में प्रवेश कर गया है। शिक्षा व्यवस्था में रुचि रखने वाले सभी लोगों को इस पर चिंतित होना चाहिए कि कभी संस्थान का पर्याय माने जाने वाले कुलपति पद की गरिमा बड़ी तेजी से गिरी है। अगर कोई शैक्षिक संस्थान अपना पुनरुद्धार चाहता है तो उसे कुलपति कार्यालय में सुधार से इसकी शुरुआत करनी होगी। कोई भी आर्थिक राहत और शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की तीव्र गति तब तक संभव नहीं है जब तक कुलपति के पद की खोई हुई गरिमा फिर से पुनस्र्थापित न की जाए। भारतीय शिक्षा के भविष्य का प्रत्यक्ष संबंध संस्थान के कुलपति पद के सम्मान से जुड़ा है। यह सुधार कार्यक्रम नई सरकार की प्राथमिकताओं में आना चाहिए।

दस केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति विवादों से घिरी रही है। जिस तत्परता के साथ तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने ये नियुक्तियां की थीं उससे भौंहें तननी ही थीं। जिस प्रकार से कुलपतियों की नियुक्तियां की जा रही हैं उससे सामान्य विश्वविद्यालयों की साख पर गंभीर संकट खड़ा हो रहा है। निजी विश्वविद्यालयों की हालत तो और भी दयनीय है। सर्वोच्च पद सामान्यतया उस व्यक्ति के पास होता है जिसकी काबिलियत विश्वविद्यालय के प्रवर्तक का करीबी और वफादार होना है। मुझे अधिक चिंता कृषि विश्वविद्यालयों की है। कृषि विज्ञान और अनुसंधान प्राथमिक रूप से कुलपति की नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करता है। यह न केवल अनुसंधान की उपयोगिता और महत्ता निर्धारित करता है, बल्कि एक तरह से देश की खाद्य सुरक्षा और 60 करोड़ किसानों की आजीविका के लिए भी जिम्मेदार है। कुछ समय पहले तक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति एक राजनीतिक कवायद मानी जाती थी। कई सालों से मैं देख रहा हूं कि कुलपतियों की एकमात्र योग्यता राजनीतिक नेतृत्व से निकटता रह गई है। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर कुलपति का नामांकन और चयन प्रक्रिया महज एक स्वांग में तब्दील हो गई है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु के कोयंबटूर में तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी का मामला देखें। यह बेहद प्रतिष्ठित संस्थान रहा है। टीएनएयू देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालयों में से एक था। देश के अन्य शिक्षण संस्थानों की तरह टीएनएयू में भी शोध और शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है, किंतु मैंने यह अपेक्षा नहीं की थी कि यह गिरावट इस सीमा तक पहुंच जाएगी कि कृषि मंत्री का निजी सचिव खुद को इस पद पर नियुक्त कराने में करीब-करीब कामयाब हो सकता है। यह तो टीएनएयू के शिक्षकों की तरफ से उठे तीव्र विरोध के कारण ही ऐसा होने से बच गया। टीएनएयू एक अपवाद है। अधिकांश विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपतियों की नियुक्ति की जा रही है जो इनके लायक नहीं हैं। यही प्राथमिक कारण है कि कृषि विश्वविद्यालय सार्थक शोध में विफल हो रहे हैं। असल में अधिकांश कृषि विश्वविद्यालय निजी बीज कंपनियों के क्रियाकलापों को दोहरा भर रहे हैं।

कुलपति के प्रति आदर भाव अब बीते दिनों की बात हो गया है। कुछ साल पहले जब हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डीआर भुंबला ने अचानक इस्तीफा दे दिया था तो इसके विरोध में वहां के छात्रों ने हड़ताल कर दी थी। यह एक असाधारण घटना थी। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा कि छात्र एक कुलपति को रोकने के लिए आंदोलन शुरू करें। हां, ऐसे तो बहुत से मामले हैं जब छात्रों ने कुलपति को हटाने के लिए हड़ताल की हो। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना के कुलपति के पद पर कार्य कर चुके विख्यात प्रशासक डा. एमएस रंधावा ने एक मजेदार घटना सुनाई थी। एक दिन हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल ने वाईएस परमार यूनिवर्सिटी आफ हार्टिकल्चरल साइंस एंड फोरेस्ट्री, सोलन के कुलपति की नियुक्ति के संबंध में उनसे सलाह मांगी। राज्यपाल ने तीन नामों का विकल्प रखा। डा. रंधावा को जो उपयुक्त लगा उसका सुझाव दिया। कुछ दिनों बाद वह अखबार में यह पढ़कर दंग रह गए कि इस पद पर किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति कर दी गई थी।

अगर आप चकित हैं कि किस प्रकार कुलपतियों की नियुक्ति होती है तो इस प्रक्रिया की तह में जाने की जरूरत है। दिखावे के लिए तो चुनाव प्रक्रिया योग्यता के आधार पर होती है। द इंडियन काउंसिल फार एग्रीकल्चरल रिसर्च सामान्य तौर पर तीन नामों का एक पैनल बनाती है। ये नाम उस राज्य के राज्यपाल के पास भेजे जाते हैं जिसमें विश्वविद्यालय होता है। विश्वविद्यालय के कुलपति होने के नाते उपराज्यपाल ही अंतिम फैसला लेते हैं, जबकि व्यवहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री की राय ही सर्वोपरि मानी जाती है। सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री की पसंद आईसीएआर को पहले ही बता दी जाती है और उम्मीदवारों का चुनाव करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाता है। कुछ समय से पेशेवर योग्यता को ताक पर रख दिया गया है। सच यह है कि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के मुकाबले कुलपति बनना आसान है, किंतु मुझे यह बात परेशान करती है कि जिस पद की कभी अभिलाषा की जाती थी, अब वह बिकाऊ हो गया है। राजनीतिक निकटता ही एकमात्र मापदंड नहीं है। आप कितना खर्च कर सकते हैं, इससे भी अंतिम फैसला प्रभावित होता है। कई कुलपतियों ने मुझे बताया है कि विश्वविद्यालय के प्रमुख होने के लिए कितनी रकम खर्च करनी पड़ती है। आम चुनाव की तरह ही कृषि व्यवसाय से जुड़ी कंपनियां खास उम्मीदवारों के लिए माहौल बनाने तथा उसके पक्ष में दबाव डालने के काम में लग जाती हैं। शोध कार्ययोजना से उन्हें क्या लेना-देना! उन्हें तो बस कंपनी के व्यापारिक हितों की चिंता होती है।

यद्यपि यह हरेक मामले में सही नहीं है, किंतु यह विडंबना है कि अधिकांश मामलों में कुलपति रुपयों से भरे सूटकेस लेकर चलते हैं। मैं किसी भी तरह कुलपति पद की अवमानना करना नहीं चाहता, क्योंकि इस पद को धारण करने वाले सभी व्यक्तियों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, किंतु गलत कार्र्यो की अनदेखी करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। पता नहीं इस सड़न को कौन बंद करेगा, किंतु इस पर असहमति की गुंजाइश नहीं है कि इस संस्थान को बचाने की सख्त जरूरत है। देश का भविष्य इस पर निर्भर है कि यहां शिक्षा का क्या स्तर होगा? शिक्षा की गुणवत्ता मुख्यत: कुलपतियों की योग्यता पर निर्भर करती है। घटिया श्रेणी के कुलपतियों के भरोसे हम महाशक्ति बनने की उम्मीद नहीं कर सकते।

http://in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_5510944.html
[देविंदर शर्मा: लेखक कृषि एवं खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं]

1 comment:

Dr. Ernest Albert said...

Oh! how much I wish that I could post my comments in Hindi only...anyway here I go :
this conflict(dvandv'),call it a paradox, is thousands of years old.Of mediocrity vs excellence...so we need'nt mourn there.Socrates,Galilleo,even Einstein all suffered due to this.You see the murphy's law of averages is so much in vogue 'where nothing can go wrong when 'average people team up in an undertaking'.You are so right that there was this time when going to meet the VC of any univ. used to be so positively uplifting an experience.Personally speaking not any more.Was it Iqbal or Sahir who lamented decades ago : har shaakh pe ullu baitha hai
anjaam e gulistan kya hoga ?
Let us accept that we Indians were 650 odd states,we still are carrying 'jirgaprasti' deep inside us.On paper we are secular which we certainly are not.Todaywe'rhindu,sikh,dalit suwarn first.Excellent,bright deserving humans later.WANT TO TRY THIS...try (specailly) with any lavarris Gau Mata who is feeding on a garbage dump NEAR OR INFRONT OF A TEMPLE...imagine someone someday cuts her tail and throws it inside the temple.Chalo chhado ji this is a bad(?) example.Even the selections of the government school teachers,college lecturers,appt ofthe professors/Chairs is up for sale...and I hate talking/writing on this anymore unless it can bring about this much change.And thanks for switching over to hindi Devinder, for a change...hindi bhashi bhai bhi 'prassann'.
Keep writing,keep scratching this put on social veneer...I like it too.