Mar 28, 2009

ग्रामीण भारत के उत्थान का मंत्र

For many of you, this article in Hindi will come as a surprise. Well, several language newspapers in India translate my writings in the local language, and this helps me to take my message to the masses. This article below is from Dainik Jagran, the largest selling newspaper in India. The title of the article, if I am translating it correctly, is something like: The Solution for the Upliftment of rural India.

In this article (published in the edition of Mar 22), I have analysed the economic plight of the farming community, some 650 million Indians, who are living in a pathetic condition. They produce food for the country, but often themselves go to bed hungry. An ungrateful nation has very conveniently dumped them, and is keen to off-load the burden.

ग्रामीण भारत के उत्थान का मंत्र

देविंदर शर्मा

सरकारी कर्मचारियों के वेतन आयोग की तर्ज पर किसान आय आयोग गठित करने की मांग जोर पकड़ रही है। तीन वर्ष पूर्व सबसे पहले मैंने किसानों के लिए सुनिश्चित मासिक आय के प्रावधान की मांग की थी। अब धीरे-धीरे देश हताश किसान समुदाय की आय सुरक्षा के बुनियादी मुद्दे पर ध्यान दे रहा है। अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ किसानों को सुनिश्चित आय प्रदान कर हम वास्तव में अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए जरूरी टानिक दे रहे हैं। कुछ समय पहले जींद में एक रैली में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने साफ-साफ कहा था कि अगर उनका दल सत्ता में आया तो वह किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रदान करेंगे। तेलगूदेशम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू भी किसानों समेत तमाम गरीबों के लिए काफी कुछ देने की घोषणा कर चुके हैं। इस बात का अहसास होते ही कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व किसानों को सीधे-सीधे आर्थिक सहायता की जरूरत के संबंध में सचेत हो रहा है, अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं में बेचैनी शुरू हो गई है। कुछ ने कहना शुरू कर दिया है कि किसानों को धन देने से वे आलसी हो जाएंगे।

इस प्रकार के विश्लेषण से मैं विचलित नहीं हूं। हममें से बहुत से लोगों को, जो किसानों को करीब से जानते हैं, यह पता है कि केवल किसान ही धन का सही इस्तेमाल करना जानते हैं। इसीलिए हम चाहते हैं कि वित्त मंत्री केवल उन्हीं के लिए अपनी तिजोरी खोलें। अन्य सभी इन संसाधनों को बर्बाद कर डालेंगे। वैश्विक कृषि की समझ के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक कृषि में खेती की दो तरह की अवधारणाएं हैं। पहली है, पाश्चात्य देशों में उच्च अनुदान प्राप्त खेती और दूसरी अवधारणा गुजारे की खेती में देखने को मिलती है, जो विकासशील देशों में प्रचलित है। गुजारे की खेती को बचाने का एकमात्र उपाय यही है कि विकसित और धनी देशों की तर्ज पर उन्हें भी प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग दिया जाए। अगर आप सोचते हैं कि मैं गलत हूं तो धनी और विकसित देशों में प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग बंद करके देख लें, इन देशों की खेती ताश के पत्तों की तरह भरभराकर ढह जाएगी। इसलिए समस्या कृषि की इन व्यवस्थाओं के प्रकार की है, जिन्हें अपनाने के लिए विश्व को बाध्य किया जा रहा है। पहली हरित क्रांति औद्योगिक कृषि व्यवस्था में फली-फूली, जिसने हमें उस संकट में फंसा दिया है, जिसका हम आज सामना कर रहे हैं। इसने भूमि की उर्वरता खत्म कर दी, कुपोषण को बढ़ाया, भूजल स्तर सोख लिया और मानव के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर तो कहर बनकर टूटी पड़ी। इससे कोई सबक सीखने के बजाय हम दूसरी हरित क्रांति की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह हरित क्रांति वर्तमान संकट को बढ़ाएगी और जैसा कि विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संघ की मंशा है, किसानों को खेती से बेदखल कर देगी।

दूसरी हरित क्रांति जीएम फसलों के घोड़े पर सवार होकर आ रही है। यह कड़े आईपीआर कानूनों में बंधी हुई है। इसके तहत बीजों पर निजी कंपनियों का नियंत्रण हो जाएगा। साथ ही बाजार व्यवस्था में भारी बदलाव कर किसानों की जेब में बची-खुची रकम भी निकाल ली जाएगी। कृषि को फायदेमंद बताने के नाम पर इस व्यवस्था में अनुबंध खेती, खाद्य पदार्र्थो की रिटेल चेन, खाद्य वस्तुओं का विनिमय केंद्र और वायदा कारोबार आदि आते हैं। अगर ये व्यवस्थाएं कारगर होतीं और किसानों के लिए लाभदायक होतीं तो फिर अमेरिकी सरकार किसानों की मुट्ठी भर आबादी को किसी न किसी रूप में भारी-भरकम प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता क्यों देती? तकलीफदेह बात यह है कि कृषि का यह विफल माडल ही भारत में आक्रामक तरीके से स्थापित किया जा रहा है। मुझे कभी-कभी हैरत होती है कि कृषि वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री और योजनाकार वास्तव में कर क्या रहे हैं? 40 साल से असरदार नौकरशाह और प्रौद्योगिकीविद किसानों को यही बताते आ रहे हैं कि वे जितना ज्यादा अन्न पैदा करेंगे, उनकी उतनी ही आमदनी बढ़ेगी। इस तरह चालीस सालों से वे किसानों को गुमराह करते आ रहे हैं। ऐसा उन्होंने क्यों किया, इसकी सीधी-सी वजह है। वास्तव में वे किसानों की मदद नहीं कर रहे थे, बल्कि किसानों की आड़ में खाद, कीटनाशक, बीज और कृषि संबंधी यांत्रिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों के व्यापारिक हितों को बढ़ावा दे रहे थे। इसीलिए एनएसएसओ के इस आकलन पर हैरानी नहीं होती कि इन 40 साल के बाद एक किसान परिवार की मासिक आय मात्र 2115 रुपये है। किसान परिवार में पांच सदस्यों के साथ-साथ दो पशु भी शामिल हैं।

छठे वेतन आयोग में सरकारी सेवा में कार्यरत चपरासी को 15 हजार रुपये वेतन का वायदा किया गया है। एक राष्ट्र के रूप में क्या हम यह नहीं सोच सकते कि किसान की कम से कम इतनी आय तो हो जितना कि एक चपरासी वेतन पाता है? जब एक किसान परिवार की मासिक आय 2115 रुपये है तो नौकरशाहों और प्रौद्योगिकी के धुरंधरों को शर्म क्यों नहींआनी चाहिए? यदि वे शर्मिंदा नहीं होते तो हमें उन्हें अपनी गलती स्वीकारने को बाध्य करना चाहिए। उन कृषि अर्थशास्त्रियों के बारे में सोचिए जो शोध प्रबंधों, अध्ययनों और विश्लेषणों के माध्यम से हमें यह घुट्टी पिला रहे हैं कि आधुनिक कृषि लाभप्रद है। अब वे कहां हैं? क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं है। उनके गलत आकलनों की वजह से ही लाखों छोटे और सीमांत किसानों का जीवन उजड़ गया है। इन बीते वर्षों में किसानों को गुमराह किया गया। उन्हें इस बात का विश्वास दिलाया गया कि अगर वे और प्रयास करते हैं तो उन्हें और लाभ होगा। यही नहीं, ये अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक और नौकरशाह अब मुक्त बाजार, कमोडिटी एक्सचेंज, वायदा कारोबार और खाद्य रिटेल चेन की दुहाई देने लगे हैं कि इससे कृषि आर्थिक रूप से समर्थ होगी। अमेरिका और यूरोप में यह प्रयोग सफल नहीं रहा है। भारत में भी यह सफल नहीं हो पाएगा।

यह ध्यान देने योग्य है कि किस तरह एक दोषपूर्ण नीति को भारत में इतनी तेजी के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है। वायदा कारोबार, कमोडिटी एक्सचेंज का फायदा किसानों को नहीं, बल्कि संट्टेबाजों, परामर्शदायक संस्थाओं, रेटिंग एजेंसियों ओर व्यापरियों को होगा। विडंबना यह भी है कि किसान नेता किसानों के लिए एक निश्चित मासिक आय की मांग नहीं कर रहे हैं। वे केवल अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कर रहे हैं। इनमें से कोई इस बात को नहीं समझ पा रहा है कि मुश्किल से 35 से 40 प्रतिशत किसान ही ऐसे हैं जो अंतत: सरकारी खरीद का लाभ उठा पाते हैं। शेष किसान समुदाय, जो वास्तव में बहुसंख्यक है, खाद्यान्न का उत्पादन करता है। अगर उनके पास थोड़ा-बहुत बेचने के लिए है तो भी उन्हें कम से कम भोजन की पूर्ति तो करनी ही है। अगर वे खुद के लिए अनाज नहीं उगाते तो देश को उतनी मात्र में खाद्यान्न आयात करना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में वे आर्थिक समृद्धि पैदा कर रहे हैं। इसलिए उन्हें भी देश के लिए पैदा की जा रही आर्थिक समृद्धि के बदले में क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।
[देविंदर शर्मा: लेखक खाद्य एंवं कृषि नीतियों के विश्लेषक हैं]

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